आजादी के लिए आत्मदाह की घटनाओं और
दुनियाभर में फैले निर्वासित तिब्बतियों के तेज होते आंदोलन के बीच चीन ने
उदार रुख अपनाने की बजाय तिब्बत पर अपना शिकंजा और कस दिया है।
तिब्बत
पर कम्युनिस्ट चीन ने एक तीर से दो निशाने लगाने का प्रयास किया है।
कम्युनिस्ट चीन ने तिब्बती लेकिन मार्क्सवादी और कट्टरपंथी लोसांग
ग्यालतसेन को अशांत तिब्बत का नया गवर्नर नियुक्त किया है।
नया
गवर्नर तिब्बत से जुड़े मामले में सीधे कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख
चेनक्वांगू को रिपोर्ट करेगा। एक तिब्बती को तिब्बत की जिम्मेदारी सौंपकर
उसने एक तरफ मानवाधिकार संगठनों और तिब्बतियों का मुंह बंद करने और दूसरी
तरफ दमन की नीति पर सतत बढ़ते रहने की चाल चली है लेकिन चीन की इस चाल से
लसांग का ल्हासा का मेयर रहने के कार्यकाल मे किए गए कारनामों से खुद ही
पर्दा उठ जाता है।
इस बीच तिब्बत की
आजादी के लिए तिब्बतियों की आत्मदाह की घटनाएं बढी है। जिसके कारण चीन को
भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव मे आना पड़ रहा है। आत्मदाह की बढ़ती घटनाओं पर
रोक लगाने और तिब्बतियो को आत्मदाह के लिए उकसाने के आरोप मे चीन ने हाल ही
में पेइचिंग में बौद्ध भिक्षु लोरांग कोचोक (40) को मौत की सजा सुनायी है
और उसके भतीजे लोसांग शेरिंग (31) को आजीवन कारावास की सजा दी है। चीन में
अब तक इस तरह की घटना में पहली बार किसी को मौत की सजा दी गई है। इन दोनों
लोगों पर आरोप हैं कि उन्होंने आठ लोगों को आत्मदाह के लिए उकसाया था जिनमे
दो की मौत हो गई है।
इस घटना के बाद
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होग ली का कहना है कि अब अंतरराष्ट्रीय
समुदाय को समझ जाना चाहिए कि दलाई लामा चीन मे अशांति बनाए रखने के लिए
कैसे-कैसे हथकंडा अपना रहे है। प्रवक्ता ने कहा कि लोरांग को पिछले साल
अगस्त में गिरफ्तार किया गया था और उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है।
गौरतलब
है कि तिब्बत पर चीन के कब्जे के खिलाफ 2009 से अब तक करीब 100 लोग
आत्मदाह कर चुके है। नई दिल्ली में हाल में तिब्बतियों ने भारी प्रर्दशन
किया था जिसमें भारत के कई प्रमुख राजनेता शामिल हुए। इस सम्मेलन में
निर्वासित तिब्बती संसद के अध्यक्ष पेनपा हेरिंग और निर्वासित प्रशासन के
प्रमुख लोकसांग सांग्ये ने कहा कि विश्व समुदाय तिब्बत में चीन के दमन को
देखें और इसके लिए चीन पर दबाव बनाएं कि वह अंतरराष्ट्रीय मीडिया, संयुक्त
राष्ट्र और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों को वहां जाने की अनुमति दे। इससे
जमीनी हकीकत सामने आ जाएगी।
चीन का कहना
है कि 1950 में जब उसकी सेना ने शांतिपूर्ण तरीके से तिब्बत को आजाद कराया
तो वहां भयावह गरीबी थी। लोगों का शोषण हो रहा था और आर्थिक विकास रुका हुआ
था और आज तिब्बत विकास कर रहा है। लेकिन इस विकासक्रम को देखने के लिए कोई
शहरी पत्रकार वहां नहीं जा सकता है। इस क्षेत्र के विकास की समीक्षा करने
की विदेशी मीडिया को भी इजाजत नहीं है।
इस
बार तिब्बत का नया प्रमुख बनाने में चीन ने एक नया प्रयोग भी किया है। इस
पद पर वहां हान चीनी की नियुक्ति की परंपरा रही है। हान समुदाय के लोग चीन
में 99 फीसदी से अधिक है और दुनियाभर के देशो में फैले हुए हैं। इसके अलावा
सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई मुल्कों में इस
समुदाय के लोगों की अच्छी खासी आबादी है। चीन के लगभग सभी क्षेत्रों में
हान चीनी हैं और वो अपने अलग खानपान के लिए जाने जाते है। इसी हान समुदाय
के सदस्य को चीन हमेशा तिब्बत का मुखिया बनाता रहा है लेकिन इस बार तिब्बती
56 वर्षीय लोसांग को यह जिम्मेदारी सौपकर चीन ने नये संकेत दिए है।
चीन
के राष्ट्रपति हू जिंताओ भी 1988 से 1992 तक तिब्बत के गवर्नर रहे हैं। यह
पद चीन में बहुत बड़ी जिम्मेदारी का पद माना जाता है और जो इस पद पर
सफलतापूर्वक काम कर लेता है। उसे पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिलने में
ज्यादा दिक्कत नहीं होती है।
बहरहाल
संकेत यह है कि तिब्बत पर चीन का शिकंजा हल्का नहीं पड़ेगा लेकिन आने वाले
दिनों में तिब्बत की मानवाधिकार की स्थिति मे कुछ सुधार हो सकता है।
हालांकि तिब्बत की मुक्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चला रहे
लोगों को लगता है कि मार्च के बाद तिब्बत में हालात सुधरने की बजाय और
बिगड़ सकते हैं।
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