Friday, June 2, 2017

सिलिकॉन वैलीः चांद पर धंधा करने का सपना

नवीन जैन ने सिलिकॉन वैली में कई सॉफ़्टवेयर कंपनियां खड़ी कीं और अरबों डॉलर भी कमाए हैं, लेकिन इन दिनों वो धरती से दूर चांद पर व्यापार करने की कोशिश में हैं.
उनका कहना है कि सिर्फ़ एक ग्रह के सहारे रह गए तो इंसानों की हालत डायनासोर जैसी होगी, तो फिर क्यों न नए आसरे तलाश किए जाएं, नए भंडारों की खोज की जाए.
पिछले महीने चांद पर ले जाने वाले उनके विमान ने सफल उड़ान भरी.
उत्तर प्रदेश में मेरठ के सामान्य से परिवार में जन्मे नवीन का इरादा चंद्रमा से हीलियम-3 लाने का है. कहानी का दूसरा हिस्सा.

पढ़ें पूरी कहानी

कैलिफ़ोर्निया के नासा रिसर्च सेंटर के कैंपस में एक उजाड़ से वेयरहाउस से उनकी नई कंपनी मून एक्सप्रेस इस ख़्वाब को हासिल करने की तैयारी में लगी है.
मक़सद है चांद पर एक रोबोटिक मिशन भेजकर ये पता लगाया जाए कि वहां से संसाधनों को ज़मीन तक कैसे लाया जा सकता है.

पिछले महीने पहली बार वो अपना स्पेसक्राफ़्ट उड़ाने में कामयाब रहे.
उनका कहना है, “ये इतिहास में पहली बार था जब कोई प्राइवेट कंपनी ने अपना हार्डवेयर, अपना सॉफ़्टवेयर लगाकर एक स्पेसक्राफ़्ट उड़ाया जो चांद तक जाने की क्षमता रखता है.”
मून एक्सप्रेस चांद तक एक प्राइवेट रोबोटिक मिशन भेजने की रेस में सबसे आगे चल रही कंपनियों में से एक है.

चांद का सपना

इमेज कॉपीरइट Getty
एक मक़सद तो है दो करोड़ डॉलर की इनाम राशि जीतना जो गूगल और एक्स-प्राइज़ की तरफ़ से रखा गया है और विजेता को 2016 से पहले चांद पर अपना स्पेसक्राफ़्ट उतारना होगा.
लेकिन नवीन जैन की नज़र इससे कहीं बड़े इनाम पर है.
उनके अनुसार चांद पर खरबों डॉलर का प्लैटिनम और हीलियम-3 मौजूद है और अगर हीलियम-3 का एक छोटा सा हिस्सा लाने में भी कामयाबी मिल गई तो पीढ़ियों की तो नहीं, लेकिन कई दशकों की ऊर्जा समस्या का हल निकल जाएगा और वो भी प्रदूषण रहित.
कहते हैं, “वो वक़्त ज़्यादा दूर नहीं है जब हनीमून का मतलब सही मायने में होगा कि आप अपनी हनी को मून पर ले जा सकेंगे.”

नई चुनौती

चांद तक की इस रेस में पिट्सबर्ग स्थित ऐस्ट्रोबॉटिक और भारत की एक कंपनी टीम इंडस से उनका कड़ा मुक़ाबला है.
उनके स्पेसक्राफ़्ट के मॉडल को देखकर यक़ीन करना थोड़ा मुश्किल सा लगता है कि वो सचमुच चांद तक जा सकेगा.
उनकी अपनी ट्रेनिंग भी सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में है फिर वो स्पेस के क्षेत्र में इतनी दूर कैसे पहुंच पाए.
उनका जवाब है, “कोई भी व्यक्ति जो अपनी फ़ील्ड का माहिर हो वो उसी दायरे में रहकर शायद कुछ नई चीज़ें सोच सके. लेकिन सही मायने में क्रांतिकारी आइडियाज़ उन्हीं से आते हैं जो उस क्षेत्र के एक्सपर्ट नहीं होते. और मेरा पलड़ा स्पेस के मामले में इसलिए भारी है क्योंकि मुझे स्पेस के बारे में कुछ नहीं पता.”
नवीन जैन का कहना है कि वो मेरठ के एक बेहद साधारण परिवार में पैदा हुए जहां परिवार का भरण-पोषण के लिए पिता की सरकारी नौकरी की आय पूरी नहीं पड़ती थी और इसलिए उनकी मां को छोटे-मोटे काम करने पड़ते थे.

ख़्वाहिश पूरी हुई

वो कहते हैं कि उन दिनों को वो भूले नहीं हैं और इसलिए उनके अंदर की एक ख़्वाहिश ये भी है कि उनकी कामयाबी भारत में लोगों को प्रेरित करेगी.
उन्होंने भारत में नए आविष्कारों और आइडियाज़ को बढ़ावा देने के लिए उद्योगपति रतन टाटा और एक्स-प्राइज़ के संस्थापक के साथ मिलकर एक इंसेटिव फ़ंड की भी शुरुआत की है.
उन्हें पूरा यक़ीन है कि अगला गूगल और फ़ेसबुक भारत से आ सकता है, लेकिन इसके लिए दो चीज़ों की ज़रूरत होगी.
वो कहते हैं, “एक तो लोगों से कहना होगा कि इतना बड़ा ख़्वाब देखो कि लोग तुम्हें पागल समझें और दूसरा कि नाकामी से मत डरो.”

पाक पर भरोसा कर इस विदेशी ने किया 'चमत्कार

दो मई 2011 को तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने घोषणा की थी कि अमरीकी सैनिकों ने पाकिस्तान में अल क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मार दिया.
ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के करीब एक घर में मारा गया था. इसके साथ ही पाकिस्तान एक बार फिर से ग़लत कारण से सुर्ख़ियों में आया था.
पाकिस्तान राजनीतिक और आर्थिक रूप से ग़लत ख़बरों के मामले में अभ्यस्त हो गया है. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान आर्थिक रूप में चरमराया हुआ देश है.
यहां विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट आ रही है. पाकिस्तान की करंसी भी कमज़ोर है और विदेशी निवेश का भी पर्याप्त अभाव है.
शायद पाकिस्तान इस ब्रह्मांड की अंतिम जगह है जहां कोई विदेशी निवेशक पैसा निवेश करने के लिए सोचता है. लेकिन मटिअस मार्टिंसन के लिए ऐसा नहीं है.

'वो बहुत मुश्किल वक़्त था'

साल 2011 में 6 महीने बाद मटिअस ने पाकिस्तान में पहला विदेशी इक्विटी फंड लॉन्च किया.
शुरुआत में इस फंड के लिए उन्हें किसी से मदद नहीं मिली. ऐसे में उन्होंने अपना और अपने पार्टनरों के दस लाख डॉलर का नकद निवेश किया.
निवेश और म्युचुअल फंड के बाज़ार में इंटरनेशनल फंड सबसे नए हैं और इनका मुनाफ़ा विदेशी बाज़ार के परफॉर्मेंस पर निर्भर करता है. माना जाता है कि इंटरनेशनल फंड पर करेंसी के उतार-चढ़ाव का रिस्क ज्यादा होता है.
लेकिन मटिअस ने यह रिस्क लिया और आज की तारीख़ में उनके इस फंड की कीमत 100 मिलियन डॉलर है.
मृदु भाषी और मुश्किल से मुस्कुराते हुए स्वीडन के मटिअस ने स्टॉकहोम से फ़ोन पर कहा, ''वो बहुत मुश्किल वक़्त था.''
मटिअस बहुत बयानबाजी नहीं करते हैं. पाकिस्तान में लादेन के मारे जाने के बाद आर्थिक निवेश को लेकर बहुत बुरा माहौल बन गया था. तब पाकिस्तान में शेयरों की कीमत में भारी गिरावट आने लगी थी.
मार्टिंसन ने बताते हैं, ''अमरीकी सैनिकों ने पाकिस्तान में एक सैन्य ठिकाने को तबाह कर दिया था. इसके बाद पाकिस्तान ने नैटो देशों के सप्लाई रूट को बंद करने का फ़ैसला किया था. तब बाज़ार में 10 फ़ीसदी की गिरावट आई थी.''

मार्टिंसन ने ख़ुद को साबित कर दिया

हालांकि इसके बाद भी मार्टिंसन पाकिस्तानी शेयर बाज़ार से अलग नहीं हुए.
इन गिरावटों के बीच सरकार ने बाज़ार को थामने के लिए कुछ कोशिश की. सरकार ने विदेशों में बसे पाकिस्तानियों से अपने घर पैसे भेजने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए टैक्स माफ़ी की योजना लॉन्च की.
मार्टिंसन याद करते हुए बताते हैं कि इससे बाज़ार में सुधार हुआ और हम लोग तीन महीने में 50 मिलियन डॉलर का फंड कर लिए.
मार्टिंसन ने इस बात को भी रेखांकित किया कि बीते दशकों में पहली बार पाकिस्तान से बाहर पैसे जाने के मुकाबले देश के भीतर ज़्यादा आया.
लगभग एक दशक बाद मार्टिंसन को लगा कि उन्होंने ख़ुद को साबित कर दिया है.
एक जून 2017 को पाकिस्तान एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में प्रवेश कर गया.
यह इस बात का संकेत है कि अपने अस्तित्व से जूझती अर्थव्यवस्था में उम्मीद की लकीर चौड़ी हो रही है. निवेशकों ने पहले से ही अर्थव्यवस्था में पैसा डालना शुरू कर दिया है.
एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स 23 उच्च वृद्धि दर वाली अर्थव्यवस्था भारत, चीन और ब्राज़ील से मिलकर बना है.
एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में पाकिस्तान का प्रमुख इंडेक्स केएसई लगातार बढ़िया प्रदर्शन कर रहा है.
अगर आपने पिछले साल जनवरी महीने में केएसई में 100 डॉलर का निवेश किया होता तो आज की तारीख़ में इसकी कीमत 164 डॉलर होती जबकि एमएससीआई में इसकी कीमत महज 137 डॉलर ही होती.
इन्हीं सफलताओं में मार्टिंसन की भी कामयाबी शामिल है.
उभरते बाज़ार सूचकांक में शरीक होना पाकिस्तान की एक उपलब्धि है. इससे निवेशकों में भरोसा जगता है. यह भरोसा वृद्धि दर, पारदर्शिता की कसौटी पर जगता है.
पाकिस्तान इस इंडेक्स का हिस्सा हुआ करता था लेकिन विदेशी बाज़ार में इसकी हैसियत बहुत नीचे थी.
2008 के आख़िर में कीमतों में नाटकीय गिरावट के कारण एक्सचेंज को चार महीनों के लिए बंद करना पड़ा था. इसका मतलब यह हुआ कि विदेशी निवेशक अपना पैसा नहीं निकाल सकते हैं.
कराची स्टॉक एक्सचेंज के मैनेजिंग डायरेक्टर नदीम नक़वी कहते हैं, ''वित्तीय संकट के कारण 2008 में हम इंडेक्स से बाहर हो गए थे. ऐसे में पाकिस्तान को देश से बाहर पूंजी जाने से रोकने में वक़्त लगा. हमने इंडेक्स में फिर से जगह पाने के लिए काफ़ी लॉबीइंग और सुधार किए.''
नदीम अब इस मामले में निवेशको को भरोसा देते हैं कि पाकिस्तान एक लिक्विड मार्केट है.
उन्होंने कहा कि 2012 में पाकिस्तान ने स्टॉक एक्सचेंज्स एक्ट पास किया.
नदीम ने कहा कि 2008 में पाकिस्तान को जिस आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था, उससे बचने के लिए इस एक्ट के ज़रिए कई सुधारों को अंजाम दिया गया.

चीन का प्रभाव

पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान की जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट) भी ऊंचाई पर है. इसके लिए पाकिस्तान में मध्य वर्ग की तरक्की को शुक्रिया कहना चाहिए.
पाकिस्तान में चीन ने वन रोड वन बेल्ट प्रोजेक्ट को लेकर काफ़ी निवेश किया है.
चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीइसी) के लिए चीन पाकिस्तान में सड़क, बंदरगाह, और राष्ट्रीय राजमार्गों पर 46 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है.
नक़वी का कहना है यह तो अभी शुरूआत है. उनका कहना है कि आप आने वाले एक और दो साल में इसका असर साफ़ देख सकते हैं. नक़वी का कहना है कि पाकिस्तान तेजी से आर्थिक प्रगति करेगा.
पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज से चीनी निवेशक भी शेयरों की ख़रीद फरोख्त कर रहे हैं. पाकिस्तान के स्टॉक एक्सचेंज में चीनियों का 40 फ़ीसदी हिस्सा है.
नक़वी का कहना है कि पाकिस्तान के मध्य वर्ग में भरोसा बढ़ रहा है और वे ज़्यादा खर्च कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि आने वाले पांच-छह सालों में पाकिस्तान की विकास दर औसत 6 फ़ीसदी से ऊपर होनी चाहिए

महाराष्ट्र में हड़ताल पर किसान, भारी संकट की आशंका

महाराष्ट्र के कम से कम सात ज़िलों के किसान सड़कों पर उतर आए हैं. गुरुवार सुबह से इन किसानों ने कृषि से जुड़े उत्पादों को लेकर जा रही गाड़ियों का चक्का जाम कर दिया है.
इन गाड़ियों के साथ तोड़-फोड़ करने की भी ख़बर है. इस आंदोलन को कई किसान संगठनों का समर्थन हासिल है. किसानों की मांग है कि उनके उत्पादों की अच्छी कीमत मिले और उनके क़र्ज़ माफ़ किए जाएं.

सब्ज़ियां, फल, दूध, पोल्ट्री से जुड़े उत्पाद और मांस लेकर मुंबई, पुणे, नाशिक और औरंगाबाद जा रही गाड़ियों को किसानों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ रहा है.
नाशिक से मुंबई और ठाणे में ज़रूरी चीज़ों की सप्लाई व्यापक पैमाने पर होती है. पर यहां के किसान भी 800 किलोमीटर से ज़्यादा लंबे मुंबई-नागपुर समृद्धि कॉरिडोर के लिए खेती की ज़मीन अधिग्रहण किए जाने का विरोध कर रहे हैं.
इस आंदोलन में अहमदनगर, नाशिक, कोल्हापुर, सांगली, सोलापुर, नांदेड़ और जलगांव के किसान शामिल हैं. इन्हीं ज़िलों से पश्चिमी महाराष्ट्र, मुंबई, मराठवाड़ा और उत्तरी महाराष्ट्र में सब्ज़ी, फल, दूध, पोल्ट्री से जुड़े उत्पाद और मांस की आपूर्ति होती है.
अगर यह आंदोलन लंबा खिंचता है तो ज़ाहिर है समस्या गंभीर रूप लेगी और इसकी धमक दिल्ली तक सुनाई दे सकती है.
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स का कहना है कि इस आंदोलन का राजनीतिक असर दो-तीन दिनों में तो दिखाई नहीं देगा लेकिन मुंबई जैसा शहर प्रभावित होता है तो इसकी गूंज दिल्ली में सुनाई ज़रूर देगी.
उन्होंने कहा, ''मुंबई एक अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस हब है. राज्य और केंद्र दोनों में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में यह आंदोलन लंबा खिंचता है तो इसकी आवाज़ दिल्ली तक जाएगी.''
महाराष्ट्र से दिल्ली पर दबाव बन सकता है लेकिन यह उस बात पर निर्भर करेगा कि आंदोलन कितने दिनों तक चलता है. अगर आंदोलन 15 से 20 दिनों तक खिंच जाता है तो कई राजनीतिक परिस्थितियां तैयार हो सकती हैं.

आख़िर किसान ग़ुस्से में क्यों हैं?

मॉनसून अच्छा रहता है तो फसल अच्छी होती है. पर फसल अच्छी हुई तो कीमत भी अच्छी मिलनी चाहिए, लेकिन किसानों को कीमत अच्छी नहीं मिलती. अरहर और सोयाबीन के मामले में किसानों को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा है. सब्ज़ियों के मामले में तो किसान बुरी तरह से परेशान हो गए. उनके लिए सब्ज़ियों को निकालना भी मुश्किल हो गया. टमाटर तो कौड़ियों के भाव बिका है.
आज भी महाराष्ट्र प्याज उत्पादन के मामले में सबसे अव्वल है. जिस नाशिक ज़िले में सबसे ज़्यादा प्याज पैदा होता है वहां प्याज़ चार रुपए किलो बिक रहा है. ऐसी स्थिति से किसान नाराज़ हैं.
प्याज़ की कीमत बढ़ती है तो मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला मीडिया शोर मचाता है. वहीं किसान जब दो रुपए और तीन रुपए किलो प्याज बेचता है तो कोई आवाज़ नहीं उठती.
यह कई महीनों, दिनों और सालों का ग़ुस्सा है जो आंदोलन का रूप ले रहा है. उन्होंने कहा कि यह स्वतंत्र भारत का पहला मौक़ा है जब किसान हड़ताल पर गया है.
यह बीजेपी के लिए अच्छी स्थिति नहीं है. बीजेपी की सरकार में किसान हड़ताल पर जा रहे हैं और यह पहला मौक़ा है. यह बीजेपी के लिए दुर्भाग्य की बात है.
यहां के किसान स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग कर रहे हैं. उसमें कहा गया है कि किसानों की जितनी लागत लगती है उससे 50 फ़ीसदी ज़्यादा मिलनी चाहिए. इसके साथ ही किसान क़र्ज़ माफ़ी की मांग कर रहे हैं. अगर सरकार इन मांगों को मान लेती है तो किसान आंदोलन से पीछे हट जाएंगे.
सरकार अपने ही किसानों की उपेक्षा कर रही है. उन्होंने कहा कि किसानों को चीनी की अच्छी कीमत मिल सकती थी लेकिन विदेश से चीनी आयात कर लिया गया. ज़ाहिर है ऐसी स्थिति में चीनी की क़ीमत कम होगी है इसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा.
सरकार को या तो मुक्त बाज़ार की स्थिति को स्वीकार करना चाहिए या नियंत्रित बाज़ार के रास्ते पर चलना चाहिए.
यह डांवाडोल की स्थिति ठीक नहीं है. इस सरकार की कृषि अर्थशास्त्र की समझ बड़ी ओछी है.

जलवायु करार से ट्रंप के पीछे हटने से दुनिया पर पड़ेगा ये 5 असर

अमरीका का यह क़दम जलवायु करार और दुनिया के लिए झटका

इसमें कोई शक नहीं है कि पेरिस जलवायु करार से राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के पीछे हटने के कारण इस समझौते के लक्ष्यों को पाना बाक़ी दुनिया के लिए और मुश्किल हो गया है. पेरिस जलवायु करार का मुख्य लक्ष्य वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी दो डिग्री से नीचे रखना है.
वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में अमरीका का 15 फ़ीसदी योगदान है. इसके साथ ही अमरीका विकासशील देशों में बढ़ते तापमान को रोकने के लिए वित्तीय और तकनीकी मदद मुहैया करना वाला सबसे अहम स्रोत है. ऐसे में अमरीकी नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं. अमरीका के क़दम का असर दूसरे राजनयिक नतीजों के रूप में भी देखा जा सकता है.
अमरीका में सियेरा क्लब के पर्यावरणविद् माइकल ब्रुने ने कहा कि यह क़दम ऐतिहासिक भूल है. उन्होंने कहा कि हमारे बच्चे इसे पीछे मुड़कर देखेंगे तो उन्हें काफ़ी निराशा होगी कि कैसे एक विश्व नेता ने वास्तविकता और नैतिकता से मुंह चुरा लिया था.

अमरीकी भूल चीन के लिए मौक़ा

पेरिस जलवायु समझौते के दौरान अमरीका और चीन के बीच अहम सहमति बनी थी. अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसमें बड़ी भूमिका अदा की थी. चीन इस बात को दोहरा रहा है वह पेरिस जलवायु करार के साथ खड़ा है.
अमरीका के पीछे हटने और पेरिस जलवायु करार पर प्रतिबद्धता जताने के लिए चीन के साथ यूरोपियन यूनियन शनिवार को बयान जारी करने वाला है. ईयू के क्लाइमेट कमिश्नर मिगल अरिआस ने कहा, ''पेरिस जलवायु करार से किसी को भी पीछे नहीं हटना चाहिए. हमने और चीन ने इसके साथ चलने का संकल्प लिया है.''
बढ़ते तापमान की चुनौती का सामना करने के लिए कनाडा और मेक्सिको भी अहम भूमिका अदा कर सकते हैं.

वैश्विक बिज़नेस नेता होंगे निराश

अमरीका का कॉर्पोरेट घराना इस बात के साथ मजबूती से खड़ा है कि पेरिस जलवायु करार से पीछे नहीं हटना चाहिए. गूगल, ऐपल और सैकड़ों बड़े जीवाश्म ईंधन उत्पादक कंपनियों ने राष्ट्रपति ट्रंप से आग्रह किया था कि वह पेरिस जलवायु करार के साथ बने रहें.
इस मामले में एक्सन मोबिल ने भी ट्रंप से पीछे नहीं हटने का आग्रह किया था. एक्सन के सीईओ डैरेन वूड्स ने ट्रंप को एक निजी पत्र लिखा था. उन्होंने इस पत्र में पेरिस जलवायु करार के साथ बने रहने का आग्रह किया था.

कोल ईंधन की होगी वापसी

दूसरे विकसित देशों की तरह अमरीका भी कोयले के ईंधन से दूर हट चुका है. ब्रिटेन साल 2025 तक कोयले से बिजली पैदा करना पूरी तरह से बंद कर देगा. अमरीका के कोयला उद्योग में अब नौकरी सौर ऊर्जा के मुकाबले आधी बची है. दूसरी तरफ़ विकासशील देश अब भी बिजली के मामले में कोयले पर निर्भर हैं.
यहां बिजली का प्राथमिक स्रोत कोयला है. ऊर्जा के दूसरे स्रोतों की कीमतों में कमी के कारण उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश उस तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं. भारत में हाल की एक नीलामी में सौर ऊर्जा की कीमत कोयले से उत्पादित होने वाली बिजली के मुकाबले 18 फ़ीसदी कम रही.

ट्रंप के पीछे हटने के बावजूद अमरीकी कार्बन उत्सर्जन में गिरावट

राष्ट्रपति ट्रंप के जलवायु करार से पीछे हटने के बावजूद अमरीका में कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी.
अनुमान है कि ओबमा ने जितनी गिरावट की तैयारी की थी उसकी आधी गिरावट आएगी.
ऐसा इसलिए क्योंकि अमरीकी ऊर्जा उत्पादन अब कोयले के मुकाबले गैस से हो रहा है.