Monday, September 10, 2012

अगला भारतीय चंद्र अभियान रूस पर निर्भर: इसरो प्रमुख

भारतीय अंतरिक्ष एवं अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख ने रविवार को कहा कि चीन के साथ असफल अंतरग्रहीय अभियान के बाद देश का अगला चंद्र अभियान रूस के निर्णय पर निर्भर करेगा। आज ही इसरो ने अपने 100वें अभियान सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।
इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने कहा, "चीन के साथ अंतरग्रहीय अभियान विफल हो जाने के बाद रूस इसकी समीक्षा कर रहा है। चंद्रयान-2 के लिए रूस ही हमें लैंडर (चांद की सतह पर उतरने के लिए यान) उपलब्ध करा सकता है। उन्होंने कहा, "भारत लूनर आर्बिटर एवं रोवर का निर्माण करेगा। रूस कह चुका है कि वह समीक्षा के बाद निर्णय लेकर हमारा साथ देगा।"
श का चंद्रयान-2 अभियान 2014 में भूसमकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलएवी) द्वारा भेजना प्रस्तावित है। राधाकृष्णनन ने कहा कि इसरो रॉकेट के साथ लूनर आर्बिटर एवं रोवर तैयार करेगा।हालांकि राधाकृष्णनन ने चंद्रयान अभियान की देरी पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।
देश के 100वें अंतरिक्ष अभियान के तहत ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) फ्रांस एवं जापान के उपग्रहों को लेकर रविवार सुबह 9.51 बजे अंतरिक्ष के लिए रवाना हुआ। इस रॉकेट के साथ 715 किलोग्राम का फ्रांसीसी उपग्रह स्पॉट 6 जा रहा है जो पीएसएलवी से प्रक्षेपित किया जाने वाला अबतक का सबसे भारी विदेशी उपग्रह है। दूसरी तरफ जापानी उपग्रह का वजन 15 किलोग्राम है।
इसरो अब इस सफलता के बाद अगले साल जाने वाले मंगल अभियान के लिए तैयारी कर रहा है।
राधाकृष्णनन ने कहा कि अगस्त 2010 से इसरो मंगल अभियान का अध्ययन कर रहा है और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में इस अभियान को मंजूरी दी है।

जब एस एम कृष्णा पर भारी पड़ीं हिना रब्बानी खार

विदेश मंत्री एस एम कृष्णा 80 साल से अधिक उम्र के और अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं, वहीं उनकी पाकिस्तानी समकक्ष हिना रब्बानी खार सिर्फ 34 साल की हैं और उनका राजनीतिक अनुभव भी कृष्णा के मुकाबले कहीं कम है। लेकिन जब मौका मीडिया से आमना-सामना का आया तो खार कृष्णा पर कहीं अधिक भारी पड़ीं।
कृष्णा और खार शनिवार को विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के बाद मीडिया से रूबरू हुए। खार कई मुद्दों पर बोलीं और उन्होंने अपने देश का पक्ष मजबूती से रखा। इस क्रम में उन्होंने एक बार भी अपने लिखित बयान का सहारा नहीं लिया, बल्कि इसके बगैर ही अपनी बात रखी।
वहीं, कृष्णा ने अपना लिखित बयान पढ़ा। इस दौरान उनका प्रभाव अपनी युवा पाकिस्तानी समकक्ष की तुलना में फीका रहा। एक पाकिस्तानी पत्रकार के कृष्णा से पूछे गए सवाल के दौरान भी खार उनके बचाव में आईं।
यहां तक कि एक भारतीय महिला पत्रकार ने भी जब उनसे सवाल किया तब भी उनका रवैया बहुत ढीला-ढाला था। उन्होंने पहले तो सवाल सुना और फिर जवाब देने के लिए तैयार हुए, लेकिन अगले ही पल फिर पूछ लिया, सवाल क्या था?


कार्टूनिस्ट केसः अंग्रेजों के बनाए कानून को कब तक ढोएंगे हम?

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की देशद्रोह के आरोप में हुई गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों के बनाए इस कानून पर बहस तेज हो गई है। इस कानून को आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने 1870 में लागू किया था। ब्रिटेन में भी 2009 में इस कानून को खत्म किया जा चुका है, लेकिन भारत में ये अब तक जारी है।
बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉक्टर बिनायक सेन, अरुधंति रॉय और अब असीम त्रिवेदी...वैसे तो इस सूची में दर्ज नामों में विचारधारा का फर्क है, लेकिन एक गजब समानता भी है। इन सभी को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गांधी और तिलक को गुलाम भारत में तो बाकी को आजाद भारत में। इन सबको देशद्रोही बताने के लिए प्रशासन ने एक ही कानून का सहारा लिया। वो कानून जिसे अंग्रेजों ने 1870 में आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए लागू किया था। इंग्लैंड में भी एक ऐसा ही कानून था जिसे जुलाई 2009 में रद्द कर दिया गया, लेकिन हिंदुस्तानी अंग्रेजों की दिलचस्पी इसे बनाए रखने में है। आरोप है कि सरकारें अपने खिलाफ चलने वाले आंदोलनों को कुचलने के लिए इस कानून का दुरुपयोग करती हैं। 
दरअसल भारतीय दंड विधान यानी आईपीसी की धारा 124 (ए) के मुताबिक कोई भी व्यक्ति जो अपने शब्दों, इशारों या किसी भी तरह से सरकार के खिलाफ नफरत या अवमानना फैलाएगा, उसे देशद्रोह का गुनहगार मानते हुए कार्रवाई की जा सकती है। इसके तहत उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है। अंग्रेजों ने इस कानून को अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के लिए बनाया था। लेकिन वक्त बदलने के बावजूद हुक्मरानों का अंदाज नहीं बदला।
इन दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ आम लोग सड़कों पर आकर तरह-तरह से अपनी भावनाएं जाहिर कर रहे हैं। अगर इस कानून का सहारा लिया जाए, तो ऐसे सभी लोगों को जेल में डाला जा सकता है। कोल ब्लॉक आवंटन में तो सरकार के साथ साथ प्रधानमंत्री पर भी सीधे आरोप लग रहे हैं। ऐसे में अब इस कानून में बदलाव की जरूरत और ज्यादा हो जाती है।
कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी ने इस बहस को तेज कर दिया है। ये सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। अंग्रेजों को देश से खदेड़ने के लिए बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी थी, और अब साफ है कि आम हिंदुस्तानी को देशद्रोही बताने वाले उनके कानूनों को भी खत्म करने के लिए कम जोर नहीं लगाना पड़ेगा।
किसी भी कानून से अपेक्षा की जाती है कि वो मानव व्यवहार को नियंत्रित करे और समय के साथ लोगों की जरूरतों और समाज में हो रहे बदलाव के साथ खुद भी बदले। बदकिस्मती से ऐसा नहीं हो पाया। आजादी के साठ साल बाद भी हम अंग्रेजों के बनाए आईपीसी को ढो रहे हैं। सवाल है कि आखिर कब तक?

Saturday, September 1, 2012

बीमा पॉलिसी सरेंडर करने पर मिलेगा ज्यादा रिटर्न

अगर आप समय से पहले इंश्योरेंस पॉलिसी सरेंडर करते हैं तो अब आपको पहले से ज्यादा रकम मिल सकती है। यही नहीं, बीमा नियामक आईआरडीए (इरडा) के प्रस्ताव के मुताबिक अगर पॉलिसीधारक 7 साल बाद पॉलिसी सरेंडर करता है तो उसे प्रीमियम की पूरी रकम वापस मिलेगी।
इरडा ने जीवन बीमा उत्पादों को बदलने की पूरी तैयारी कर ली है। इरडा के ड्राफ्ट प्रस्ताव के मुताबिक कंपनियों को अब ग्राहकों के पॉलिसी सरेंडर करने पर गारंटीड रकम देनी होगी।


कंपनियों को अब दूसरे और तीसरे साल में पॉलिसी सरेंडर करने पर प्रीमियम का 50 फीसदी हिस्सा, चौथे साल में पॉलिसी सरेंडर करने पर प्रीमियम का 75 फीसदी हिस्सा और पांच से सात साल के बीच पॉलिसी सरेंडर करने पर प्रीमियम का 90 फीसदी हिस्सा देना होगा। सात साल बाद पॉलिसी सरेंडर करने पर प्रीमियम की पूरी रकम देनी होगी।
फिलहाल 3 साल बाद पॉलिसी सरेंडर करने पर प्रीमियम का सिर्फ 30 फीसदी हिस्सा ही मिलता है और इसमें भी पहले साल के प्रीमियम की रकम शामिल नहीं होती है।
फाइनेंशियल एक्सपर्ट हर्षवर्धन रुंगटा के मुताबिक इंश्योरेंस पॉलिसी धारकों के लिए भले ही ये अच्छी खबर है, लेकिन इंश्योरेंस कंपनियों को इस पर आपत्ति है। कंपनियों के मुताबिक इससे पॉलिसी होल्डर बिना किसी वजह के भी पॉलिसी सरेंडर कर सकते हैं। कंपनियों का ये भी कहना है कि इससे पारंपरिक जीवन बीमा उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
ये नियम नए प्रोडक्ट पर ही लागू होंगे और इनमें हेल्थ प्रोडक्ट और टर्म इंश्योरेंस प्रोडक्ट शामिल नहीं होंगे। यूलिप पर पहले से ही गारंटीड सरेंडर रकम का नियम लागू है। इरडा के इस प्रस्ताव पर फिलहाल इंश्योरेंस कंपनियों की रेगुलेटर से बातचीत जारी है और उम्मीद है ग्राहकों को राहत देने वाला ये नियम जल्द लागू हो जाएगा।